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गीत-संगीत
Thursday, May 12, 2016
आपका अपना बैतूल है।
Thursday, January 9, 2014
खुशियां और गम सहती है
फिर भी वो चुप रहती है।
अब तक किसीने न जाना,
जिन्दगी क्या कहती है।।
अपनी कभी, तो कभी अजनबी,
आंशू कभी तो कभी है हसी
दरिया कभी तो कभी तिस्नगी
लगती है ये तो।
खुशियां और गम सहती है
फिर भी वो चुप रहती है।
अब तक किसीने न जाना
जिन्दगी क्या कहती है।।
खामोंशियों की धीमी सदा है
ये जिन्दगी तो रब की दुआं है
‘‘छूके किसीने इसको देखा कभी ना
एहसास की है खुशंबू,
महकी हवा है’’
खुशियां और गम सहती है
फिर भी वो चुप रहती है।
अब तक किसीने न जाना
जिन्दगी क्या कहती है।।
मन से कहों तुम, मन की सुनों तुम
मनमीत कोई मन का चुनों तुम
कुछ भी कहेगी दुनियां, दुनिया की छोड़ो
पलकों में सचके झिलमिल सपनें बुनों तुम
खुशियां और गम सहती है
फिर भी वो चुप रहती है।
अब तक किसीने न जाना
जिन्दगी क्या कहती है।।
अपनी कभी, तो कभी अजनबी,
आंशू कभी तो कभी है हसी
दरिया कभी तो कभी तिस्नगी
लगती है ये तो।
खुशियां और गम सहती है
फिर भी वो चुप रहती है।
अब तक किसीने न जाना
जिन्दगी क्या कहती है।।
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